इधर-उधर सरकती गलियाँ · सीज़न 1 · एपिसोड 6
वह गली जिसने पूछा
AI से लिखा और प्रकाशित होने से पहले जाँचा हुआ। यह काल्पनिक कहानी है: इसके पात्र और जगहें मनगढ़ंत हैं।
अब तक की कहानी
मैरोविक में आधी रात के फेरे पर गलियाँ अपनी जगह बदल लेती हैं, जब तक वेफ़ाइंडर उन पर चॉक से निशान न लगा दें। प्रशिक्षु आइलो ने जाना है कि गलियाँ उसकी बात सुनती हैं। लूज़ क्वार्टर में उसकी मुलाकात पिम हैरो और हॉलिन लेन से हुई, जो गैप की ओर जाना चाहती है। आइलो ने पिम से वादा किया कि वह आधी रात को लौटकर गली की बात सुनेगी।
ग्यारह बजे आइलो अपने जूते हाथ में लिए, सिर्फ़ मोज़ों में मास्टर फ़ेन के घर से निकली। मास्टर फ़ेन कुर्सी पर सो रही थीं और ज़ंग लगे फाटक की तरह खाँस रही थीं। आइलो ने एक पर्ची लिखी: गली की बात सुनने जा रही हूँ। सूरज निकलने तक लौट आऊँगी। स्याही सूखने से पहले ही मॉप उसे खा गया।
आइलो ने दूसरी पर्ची लिखकर चायदानी के नीचे रख दी। मॉप ने चायदानी को गहरी उदासी से देखा, पर उसे छोड़ दिया।
लूज़ क्वार्टर तक 1,412 कदम थे। आइलो ने एक-एक कदम गिना। यहाँ किसी मोड़ पर चॉक नहीं थी, सफ़ेद निशान तक नहीं। मॉप उसके आगे-आगे दुलकी चाल से चल रहा था और हमेशा अच्छे पत्थरों पर ही पैर रखता था, जैसे उसके खुरों में कोई नक्शा छिपा हो।
पिम हैरो हॉलिन लेन के ऊपरी सिरे पर दहलीज़ पर इंतज़ार कर रही थी। गाँठों वाली रस्सी उसकी कमर में लिपटी थी और चॉक का टुकड़ा मुट्ठी में था। उसकी नाक हमेशा की तरह कालिख से सनी थी।
"तुम आ गईं," पिम ने कहा।
"मैंने कहा था कि आऊँगी।"
"लोग तो बहुत कुछ कह देते हैं।" पर वह मुस्कुरा दी, और उसने अपनी मुस्कान छिपाई नहीं।
आइलो के मोज़ों के नीचे गली गर्म लग रही थी, जैसे सोती हुई बिल्ली का बदन। आधे रास्ते में लैंपों से भरा एक ठेला खड़ा था, और उसके पास बरिक ऑस चम्मच से एक टूटे पहिये को ठकठका रहा था। "शुभ संध्या, शुभ संध्या," उसने आइलो से कहा, और फिर एक पीतल के लैंप से बोला, "नहीं, मैं तुम्हें भूला नहीं हूँ, बस ज़रा व्यस्त हूँ।"
"वह शाम ढलते लैंप बेचने आया था," पिम ने फुसफुसाकर कहा। "तब से बस निकलने ही वाला है।"
"पहिया टूटा है," बरिक ने खुशी-खुशी कहा। "लैंपों को कोई फ़िक्र नहीं। उन्होंने फेरे को कभी अंदर से नहीं देखा।"
आइलो ने ऊपर देखा। हब की घड़ी में आधी रात होने में दस मिनट बाकी थे। ठेले को कहीं ले जाने का वक़्त नहीं था। उसने दो उँगलियाँ होंठों पर रखीं और सीटी बजाई।
गूँज धीरे-धीरे लौटी। वह जम्हाई की तरह खिंचती चली गई। पिम बिल्कुल ठिठक गई। "यह तो धीमी गूँज है," उसने कहा। "है ना? अब यह चलेगी, हम चाहें या न चाहें।"
"हाँ," आइलो ने कहा। "तो बेहतर है कि हम इसी से पूछ लें कि कैसे।"
वह घुटनों के बल बैठी और हथेली पत्थरों पर सपाट रख दी। उसने साँसें गिनीं, अंदर-बाहर, चालीस तक। उसकी हथेली तक जो चीज़ पहुँची, वह शब्द नहीं थे। वह एक झुकाव था, जैसे कोई रस्सी धीरे-धीरे शहर के किनारे की ओर खींच रही हो। गली फेरे के हाथों इधर-उधर ढोए जाने से थक चुकी थी। वह देखना चाहती थी कि कोहरे के उस पार क्या है। उस चाहत के नीचे एक छोटी-सी, डगमगाती घबराहट थी, वैसी जैसी नहाने से पहले मॉप को होती है।
"यह गैप जाना चाहती है," आइलो ने कहा। "और थोड़ा डर भी रही है।"
पिम ने थूक निगला। "क्या यह अंदर चली जाएगी?"
"मुझे नहीं पता।" आइलो ने साफ़-साफ़ कहा, क्योंकि झूठ बोलती तो पिम भाँप लेती। "मैं इससे रुकने को कह सकती हूँ। यह मेरे लिए थम भी जाएगी। लेकिन वह ऐसा होगा जैसे कोई दरवाज़े के दूसरी तरफ़ से खटखटा रहा हो और हम इस तरफ़ से उसे दबाए खड़े हों।"
"यह मेरी गली है," पिम ने धीरे से कहा। फिर वह भौंहें सिकोड़कर बोली, "नहीं। यह मेरी नहीं है। मैं बस यहाँ रहती हूँ।"
"मेरे लैंप जाने के पक्ष में वोट देते हैं," बरिक ने घोषणा की। "सारे ग्यारह। दो ने वोट नहीं दिया, पर वे हमेशा से शर्मीले हैं।"
आइलो ने हाथ पत्थरों पर टिकाए रखा। "मैं तुम्हारे साथ चलूँगी," उसने गली से ज़ोर से कहा, थोड़ा बेवक़ूफ़ी भरा लगा, पर उसे परवाह नहीं थी। "लेकिन धीरे चलना, प्लीज़। कोहरे से पहले रुक जाना। हम सबको अपने ऊपर रहने देना।" उसकी हथेली के नीचे की गर्माहट में एक नन्ही, आभार भरी सिहरन दौड़ गई।
हब की घंटी बजने लगी। लूज़ क्वार्टर में बाकी गलियाँ कराहने, उछलने और लड़खड़ाने लगीं। हॉलिन लेन नहीं उछली। वह ऐसे उठी जैसे कोई गहरी साँस ले रहा हो, और फिर सरकने लगी। पिम ने रस्सी का एक सिरा ठेले से बाँधा और दूसरा अपनी कमर से। मॉप ने चारों खुर जमा लिए और इत्मीनान से लैंप की एक बत्ती चबाने लगा।
वे उन गलियों के पास से सरकते गए जो गलत दिशा में झूल रही थीं, एक ऐसे पुल के पास से जो अपनी नदी से छूट गया था, और एक लंबी दीवार के पास से जो खुद को छोटी दीवार में बदल रही थी। आइलो उन कदमों को गिनती रही जो वह चल ही नहीं रही थी, छह सौ पर गिनती भूल गई, और ज़ोर से हँस पड़ी। हब की मीनार छोटी होती गई, पर रही ठीक अपनी जगह पर। लैंप आपस में टकराकर बज रहे थे, जैसे टीन का कोई खुशमिज़ाज ऑर्केस्ट्रा हो।
फिर सामने धूसर रंग उभरा, चट्टान जितनी ऊँची कोहरे की दीवार। गली धीमी हुई, और फिर और धीमी, ठीक वैसे जैसे आइलो ने कहा था। उसने दो उँगलियाँ होंठों पर रखीं और एक बार फिर सीटी बजाई। इस बार गूँज तेज़ और चमकदार लौटी, पत्थरों से टकराकर चटकती हुई। गली ठोस थी। वह रुक गई थी।
वे कोहरे से दस कदम दूर थे। वह ठंडा और खामोश था, और हिल नहीं रहा था। पिम ने एक साँस छोड़ी जो थोड़ी काँप रही थी। "तुमने पूछा," उसने कहा। "और इसने सुन लिया।"
"पहले इसने पूछा था," आइलो ने कहा।
बरिक ठेले पर झुका और एक छोटे लैंप से कुछ फुसफुसाया, जो कभी जला ही नहीं था। वह अपने आप जगमगाने लगा, एक पतली, स्थिर सुनहरी लौ में। और कोहरे के बहुत भीतर, इतनी धीमी कि आइलो को लगा उसने कल्पना कर ली है, कुछ चमककर जवाब दे रहा था.
आज के लिए बस इतना ही।